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“चर्च संपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा शिकंजा!” अवैध बिक्री पर सख्ती, —देशभर में मची कानूनी हलचल

CNI ट्रस्ट एसोसिएशन पहले ही ठहराई जा चुकी अवैध, अब संपत्ति अधिकारों पर बड़ा खुलासा

🚨⚖️ “देशभर में चर्च संपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक प्रहार!” ट्रस्ट संपत्ति घोषित, अवैध बिक्री पर कड़ा शिकंजा—CNI ट्रस्ट एसोसिएशन पहले ही ठहराई जा चुकी अवैध, अब संपत्ति अधिकारों पर बड़ा खुलासा 🚨⚖️

अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने भारत में चर्च की संपत्तियों को लेकर चल रहे विवादों और कथित अवैध बिक्री पर निर्णायक और सख्त रुख अपनाया है, जिससे देशभर में कानूनी, प्रशासनिक और धार्मिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि चर्च की संपत्तियां किसी भी व्यक्ति, ट्रस्टी या संस्था की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि यह “न्यास संपत्ति” (Trust Property) हैं, जिन्हें केवल समुदाय के हित में संरक्षित और संचालित किया जाना चाहिए। ऐसे में इन संपत्तियों की बिक्री, लीज या हस्तांतरण बिना निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के न केवल अवैध है, बल्कि यह आपराधिक दायित्व भी उत्पन्न करता है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से चर्च ऑफ साउथ इंडिया (CSI) से जुड़ी संपत्तियों की कथित अवैध बिक्री के मामलों में आपराधिक कार्यवाही को पुनः शुरू करने का निर्देश देकर यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब धार्मिक संपत्तियों में किसी भी प्रकार की मनमानी या भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इन फैसलों के साथ एक और अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य सामने आता है, जिसे लंबे समय से अनदेखा किया जाता रहा है। वर्ष 2013 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन (CNITA) को अवैध घोषित किया जा चुका है। अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया था कि यह संस्था वैधानिक रूप से मान्य नहीं है और इसका चर्च ऑफ इंडिया (CIPBC), इंडियन चर्च ट्रस्टीज, चर्च मिशनरी सोसाइटी (CMS) तथा संबंधित डायोसीज़ जैसी संस्थाओं की संपत्तियों पर कोई अधिकार नहीं है, जो भारतीय चर्च अधिनियम 1927 (Indian Church Act, 1927) के अधीन आती हैं। इस निर्णय का सीधा प्रभाव यह है कि यदि CNITA या उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति द्वारा इन संस्थाओं की संपत्तियों की बिक्री, लीज या हस्तांतरण किया जाता है, तो वह स्वतः ही अवैध और निरस्त माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया निर्णयों में यह भी दोहराया है कि चर्च संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और बहु-स्तरीय अनुमोदन आवश्यक है। किसी भी संपत्ति की बिक्री के लिए स्थानीय चर्च समिति का प्रस्ताव, संबंधित डायोसीज़ परिषद की स्वीकृति, ट्रस्ट एसोसिएशन के बोर्ड का निर्णय, कंपनी अधिनियम 2013 के प्रावधानों का पालन तथा सार्वजनिक नीलामी जैसी प्रक्रियाएं अनिवार्य मानी गई हैं, ताकि संपत्ति का सही बाजार मूल्य प्राप्त हो और किसी प्रकार की हेराफेरी या भ्रष्टाचार की संभावना समाप्त हो सके।

मद्रास उच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए यह संकेत दिया है कि देशभर में ईसाई संस्थाओं की हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियां संदिग्ध परिस्थितियों में बेची गई हैं या विवादों में फंसी हुई हैं। नवंबर 2024 में अदालत ने 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की संपत्तियों पर सवाल उठाते हुए सख्त नियामक ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया था। कुछ न्यायालयों ने तो यहां तक सुझाव दिया है कि चर्च संपत्तियों के लिए वक्फ बोर्ड की तर्ज पर एक स्वतंत्र नियामक संस्था बनाई जानी चाहिए, जो इन संपत्तियों की निगरानी और संरक्षण सुनिश्चित करे।

संवैधानिक दृष्टिकोण से देखें तो अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपनी संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य से जुड़े कानूनों के अधीन रखा गया है। वहीं अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक संवैधानिक कानूनी अधिकार है, जिससे राज्य सरकारों को इन संपत्तियों के नियमन और जांच का अधिकार प्राप्त होता है।

उत्तर प्रदेश में चर्च संपत्तियों की बिक्री पर विशेष रूप से सख्त नियम लागू हैं। वर्ष 2000 के सरकारी आदेश के अनुसार, किसी भी चर्च संपत्ति को बेचने या पट्टे पर देने से पहले संबंधित जिले के जिला मजिस्ट्रेट (DM) से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 92 के तहत अदालत की अनुमति, पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 का पालन तथा धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1980 के प्रावधान भी लागू होते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि चर्च की भूमि का व्यावसायिक उपयोग अवैध है और राज्य सरकार को ऐसी संपत्तियों का पूरा रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं, ताकि अतिक्रमण और दुरुपयोग को रोका जा सके।

हाल के वर्षों में झांसी, प्रयागराज और अन्य जिलों से कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां कथित रूप से ट्रस्टियों और चर्च अधिकारियों ने भूमि माफियाओं के साथ मिलकर संपत्तियों को अवैध रूप से बेचने या हस्तांतरित करने का प्रयास किया। इन मामलों में अदालतों ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि ट्रस्टी केवल संरक्षक होते हैं, मालिक नहीं, और वे व्यक्तिगत लाभ के लिए संपत्तियों का उपयोग नहीं कर सकते। बिना वैध प्राधिकरण के किया गया कोई भी लेनदेन स्वतः शून्य (Void) माना जाएगा और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।

जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया कि कोई भी किरायेदार लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने के आधार पर चर्च या किसी धर्मार्थ संस्था की संपत्ति पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता। इस निर्णय ने धार्मिक संस्थाओं को बड़ी राहत प्रदान की है और अवैध कब्जों पर रोक लगाने में मदद की है।

उत्तर प्रदेश सरकार को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि चर्च संपत्तियों के राजस्व अभिलेखों को सुरक्षित और अद्यतन रखा जाए, विशेष रूप से वे संपत्तियां जो ब्रिटिश काल से चली आ रही हैं। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के स्वामित्व विवाद या अवैध लेनदेन को रोका जा सके।

समग्र रूप से देखें तो सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के ये फैसले यह स्पष्ट करते हैं कि अब धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में जवाबदेही, पारदर्शिता और कानूनी अनुशासन अनिवार्य होगा। चर्च की संपत्तियां केवल जमीन नहीं, बल्कि एक समुदाय की आस्था, इतिहास और सामाजिक संरचना का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा और सही उपयोग सुनिश्चित करना न केवल कानूनी आवश्यकता है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। यदि इन नियमों की अनदेखी की जाती है, तो संबंधित व्यक्तियों को न केवल कानूनी दंड का सामना करना पड़ेगा, बल्कि यह समुदाय के विश्वास के साथ भी बड़ा धोखा होगा। आने वाले समय में यह सख्ती चर्च संपत्तियों से जुड़े भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और एक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

लेख: एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
📞 संपर्क: 8217554083

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